गुगल के गुलाम
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एक दोस्त के पुत्र ने जब सबाल किया कि २०१२ को नेशनल मथेमतिकल इयर की घोषणा किसने की है,तब मै वाकई ये नहीं बता सका और गुगल पर सर्च करके डॉ. मनमोहन सिंह जी के बारे में बता पाया. कभी मै अपने आप को सामान्य जानकारी का पुरोधा समझता था. लेकिन मेरा वो भ्रम टूट गया और एहसास हुआ कि धीरे धीरे हम बौधिक रूप से कमजोर होते जा रहे है और एक बौधिक गुलामी की ओर बढ़ रहे है.गुलामी का ये फंदा चौतरफा है और जाना हुआ है. जैसे सिगरेट पिने वाला आदमी ये जानते हुए भी पीता है कि ये नुकसानदायक है किन्तु मजेदार है , उसी प्रकार गूगल का हर गुलाम ये जानता है कि वो बौधिक रूप से कमजोर होता जा रहा है.
अपने शहर के ए टी एम से लेकर किसी एक्सक्लूसिव शो रूम तक की जानकारी के लिए धीरे धीरे हमलोग गूगल पाण्डेय पर निर्भर होते जा रहे है. कहते है कि ज्ञान बांटने से ज्ञान बढ़ता है और वाकई ज्ञान बढ़ रहा है लेकिन गूगल का बढ़ रहा है. इसमें कोई शक नहीं की हमलोग बुद्धिमान होते जा रहे है तभी तो गूगलवा से हर चीज उगलवा लेते है लेकिन हमारे स्वयं के विद्वता का ह्रास हो रहा है.जिस विद्वता के बारे में हमारे संस्कारो में युगों युगों से प्रचलित है कि ये ऐसा धन जिसे भाइयो के बंटवारे में न बांटा जा सकता है और ना ही चोरो द्वारा चुराया जा सकता है.हमारी बुधिमत्ता हमारी समस्यायों का निदान तो कर सकता है लेकिन ये विद्वता ही है जो सर्वकालिक और सार्वदेशिक उपाय दे सकता है. मतलब बुधि निजी मामलो को हल करने में सक्षम है और विद्या सार्वजानिक मामलो को निदान दे सकता है.
अभी हमलोग सुचना क्रांति के संक्रमण काल से गुजर रहे है और गूगल
facebook , ट्विट्टर etc सुचना क्रांति से पैदा हुए साम्राज्य के प्रतीक है......और ये ऐसा साम्राज्य है जिसकी प्रजा बनाने पर भी अफ़सोस और न बनने पर और ज्यादा अफ़सोस..
.....समय आने पर गूगल कि गुलामी से हो सकता है हम आजाद हो जाये...उम्मीद पर दुनिया टिकी है ...जय हो.