बुधवार, 30 नवंबर 2011

एफ डी आई यानी राजनीती का फिक्सड डिपोजिट ...

लोग आज भारत में सीधे विदेशी निवेश का जोरशोर से समर्थन और विरोध कर रहे है.समर्थको और विरोधियों दोनों के अपने तर्क है.कोई कह रहा है कि किसानो को फायदा होगो तो कोई कह रहा है कि उपभोक्ताओं को तो कोई किसी को फायदा बता रहा है.किसी को व्यापारियों का नुकसान दिख रहा है तो किसी को भारत फिर से गुलाम दिखता नजर आ रहा है... भीड़ तंत्र और तर्क तंत्र का समावेशी रूप ही वास्तव में लोक तंत्र  होता है.सबका अपना डफली और अपना राग है.इसलिए मेरे भी डफली पर अपना राग है.
तर्क 1 कि हम फिर से गुलाम हो जायेंगे :: जो लोग ये तर्क दे रहे है कि विदेशी निवेश से हम गुलाम हो जायेंगे .उनके इस तर्क में कोई दम नहीं है. आज भारत का हर तीन में से दो  नागरिक हिदुस्तान उनिलीवर  जैसी विदेशी कंपनी का उपभोक्ता है.हम किसी न किसी रूप में विदेशी कंपनी के उत्पाद का उपयोग करते ही है.पैर के जूता से लेकर सीर  के टोपी तक और रसोई से लेकर टोइलेट तक हम विदेशी कंपनी के उत्पाद पर निर्भर  तो पहले से ही है. जब  हम अभी  गुलाम नहीं है तो तब गुलाम कैसे हो जायेंगे.क्या हम खुले प्रतिस्पर्धा से डरते है ? यदि हम डरते है तो पुरे दुनियां में अपना नाम  रौशन करने के लिये   मरते क्यूँ है?  जब मित्तल का स्टील साम्राज्य पुरे दुनियां में  फैलता   है तब हम ख़ुशी  से फुले नहीं समाते तो वाल मार्ट जैसी कंपनी से प्रतिस्पर्धा करने में डरते क्यों है.  कौन  जानता है किशोर बियानी का BIG BAZAR दुनिया का बिग्गेस्त BAZAR बन जाये और वाल मार्ट को भी लील जाये. पर ऐसा भी  तव्ही    होगा जब हम खुली प्रतिस्पर्धा में 
शामिल होगे
तर्क 2 कि किसानो को फायदा होगा :: वाल मार्ट जैसी कंपनी भारत में किसानो के भलाई करने के लिए तो आएँगी नहीं. ये तो व्यापार का मूलभूत सिधांत है कि सस्ता  लो    और मुनाफे में बेचो. अब ये अलग बात है कि बाजार के बदलते समीकरण में किसी को फायदा हो जायेगा. उसके लिए हमारे किसानो को भी प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार रहना चाहिए. जैसे चाय का उत्पादन भारत में विदेशी द्वारा ही किया गया था और कालांतर में भारत इसके बड़े उत्पादको में से एक हो गया . हो सकता है उसी तरह कि कोई और फसल वो ये के जलवायु के अनुरूप अपने फायदे के लिए लाये.
तर्क ३ कि व्यापारियों को नुकसान होगा:: बाजार के बदलते स्वरुप के हिसाब से व्यापार का भी स्वरुप बदल जायेगा. व्यापार का एक नया वर्ग पैदा होगा . व्यापार के स्वरुप में कुछ उसी तरह का बदलाब आयेगा जैसे स्टील के बर्तन के आ जाने से ठाठेरी बाजार का अस्तित्व बदल गया.
तर्क ४ कि उपभोक्ताओ को फायदा होगा :: विज्ञानं के खोज के बारे में प्रचलित कहावत है कि आवश्यकता आविष्कार कि जननी है. उसी तरह से वाल मार्ट जैसी बाजार में तरह तरह के सामानों का  रहना  आवश्यकता कि जननी हो जायेगा.  वैसे में उपभोक्ता खर्चीला हो जायेगा.
अंत में ,
सबसे ज्यादा फायदा तो राजनेता लोगो को होगा . राजनेता और उनकी पार्टी भी तो किसी वालमार्ट से कम नहीं. उनके एहा भी तो तरह तरह के वैचारिक उत्पाद बिकते है और वो भी अंतर राष्ट्रीय स्तर के . उनलोगों को विरोध और समर्थन तो  FIXED डीपोजित कि तरह है जो चुनाव के वेला में परिपक्व होगा.

JAI हो ....

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