बुधवार, 15 अक्टूबर 2014

घोड़ाडोंगरी स्टेशन को मेरा सलाम

उस दिन मै और मेरे मित्र श्री विजय सिन्हा जी रेलवे का पेपर देने के लिए नागपुर जा रहे थे.हमदोनो ने या कहे हमलोगों ने नागपुर जाने के लिए इटारसी स्टेशन पर ''दक्षिण एक्सप्रेस'' को पकड़ा...पता नहीं किस विशेषाधिकार के तहत बहुत सारे  परीक्षार्थियों का हुजूम दक्षिण एक्सप्रेस के शयनयान श्रेणी (स्लीपर क्लास ) में प्रवेश कर गया....ट्रेन इटारसी से खुली.सम्बंधित कोच का टिकट चेकिंग स्टाफ आया और सबको चेक करने लगा.कुछ लोग ''पास ''लिए हुए थे बाकी बिना किसी अधिकार पत्र या टिकट के सिर्फ इस अथॉरिटी के साथ ट्रेन में घुसे थे कि रेलवे के नौकरी के लिए परीक्षार्थी है ...मै तो कहूँगा वो चेकिंग स्टाफ बहुत भला मानस था जिसने सलाह दिया कि अगले दो स्टेशन के बाद यह ट्रेन रुकेगी और आपलोग उस स्टेशन पर उतर जाना और पीछे से आ रही फ़ास्ट पैसेंजर पर चढ़कर  नागपुर चला जाना.आगे स्टेशन पर गाड़ी रुकी.बहुत सारे परीक्षार्थी उत्तर गए.लेकिन जैसे ही  ट्रेन फिर से मूव की ..ज्यादातर अनुभवी लोग फिर ट्रेन में सवार हो गए.हम जैसे कुछ अनुभवहीन लोग दुबारा नहीं चढ़ पाए या यूँ कहे की चढ़ने की कोशिश ही नहीं की...जिस स्टेशन पर हमलोग उतरे या यूँ कहे कि उतारे गए उस स्टेशन का नाम था ''घोड़ाडोंगरी''.
बिलकुल ही अपरिचित जगह ,छोटा सा स्टेशन ,छोटा सा टिकेट काउंटर .......बहरहाल हमलोगों ने लाइन में खड़ा होकर टिकेट लेने का फैसला किया.हमलोग लाइन में काफी पीछे थे और फ़ास्ट पैसेंजर के आने का संकेत हो गया...पहले से लाइन में लगे हुए ज्यादातर लोग लोकल नारंगी व्यापारी थे ....जब उनलोगों को मालूम हुआ कि हमलोग परीक्षार्थी है और ''बाहर'' के है तो वे पीछे हो गए और टिकेट बाबु से हमलोगों को पहले टिकट देने का अनुरोध किया ....हमलोगों ने समय रहते नागपुर का टिकेट लिया और ट्रेन भी पकड़ी ........मुझे अपने अभीतक के लगभग दो लाख किलोमीटर तक रेल यात्रा करने में घोड़ाडोंगरी के लोगों के द्वारा उस दिन दिखाई गयी सहृदयता को सर्वाधिक प्रभावित किया है ....मै घोड़ाडोंगरी के लोगों की सहृदयता को ह्रदय से नमन करता हूँ
(यह घटना वर्ष २००३ की है )

गुरुवार, 9 अक्टूबर 2014

लोग करते है ...........

लोग करते है .............
अपने लक्ष्य के पूर्ति के लिए समय के आभाव को पूरा नींद में कटौती कर के करते है
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और
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अपने लक्ष्य के पूर्ति के लिए धन के आभाव को पूरा खाने के गुणवता में कटौती कर के करते है ..
कटु सत्य ==हम अपने लक्ष्य की पूर्ति के लिए अंतिम रूप से अपने स्वस्थ्य की कटौती करते है ..................जय हो

लोग कहते है ....

लोग कहते है .......
''फर्स्ट इम्प्रैशन इज लास्ट इम्प्रैशन''
और लोग ये भी कहते है ......
''अंत भला तो सब भला''
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दुनिया में लोग कितने कन्फ्यूज्ड है और दुनिया को भी कंफ्यूज करने में लगे रहते है .....जय हो

शनिवार, 4 अक्टूबर 2014

गाँधी जी के नाम पर

गाँधी जी के नाम पर
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वर्ष 2014 में बापू जी के जयंती पर भारत सरकार के तमाम कार्यालयों में विशेष कार्यक्रम हुए. इन विशेष कार्यक्रमों में झाड़ू जैसा अदना चीज भी खास बन गया.या यूँ कहें कि ''झाड़ू लगाना'' परमपरागत पढाई के तीन विधाओं --कला ,विज्ञान और वाणिज्य में से किसी एक का ना रहकर तीनों का हिस्सा हो गया ...झाड़ू जब कैमरा के सामने लगाया जाय तो यह ''कला'' है ...झाड़ू जब साफ़ सफाई के लिए लगाया जाय तो यह ''विज्ञान'' है.....झाड़ू जब पापी पेट के लिए लगाया जाय तो यह ''वाणिज्य'' है.
प्रधानमंत्री जी के स्वच्छता अभियान में जो देश ने देखा वो कला भी था ,विज्ञान भी था और वाणिज्य भी था ..समाज सेवा तो सिर्फ हेडलाइंस में था .इस पुरे कार्यक्रम के लिए सरकारी फंडिंग की गयी थी ना सिर्फ साफ़ सफाई से संवंधित सामानों के खरीदारी के लिए बल्कि इस सोसेबाजी के फोटोग्राफी के लिए ताकि ये मालूम किया जा सके कि ''सफाया '' करने के फ़िराक में रहने वाले किन किन बाबुओ ने ''सफाई'' के लिए कसमें खाई और झाड़ू लगाया....कितना अच्छा होता यदि प्रधानमंत्री जी विशेष अभियान के दिन उन सफाई कर्मचारियों को छुट्टी दे देते जो डेली झाड़ू लगाते  है ....और तब देखा जाता कि इस अभियान में कितना सोसाबाजी हुआ है और कितना सफाई .
....बहुत वर्षों के बाद यह एहसास तो हुआ ही कि 2 अक्टूबर को महान बापू की जयंती है ...नहीं तो राष्ट्रीय अवकाश के नाम पर सरकारी बाबु इस डेट में ऐश करते थे ....इमरजेंसी ड्यूटी वाले बाबु ड्यूटी करके कैश करते थे ....
----जिस देश का विज्ञान इतना आगे बढ़ गया हो कि मंगल ग्रह पर भी फतह कर ले उस देश के प्रधानमंत्री जी को देश के नागरिकों को सफाई जैसे मूलभूत चीज से अवगत कराने के लिए अभियान चलाना पड़ता है यह बहुत ही अफ़सोस की बात है  ...जय हो