उस दिन मै और मेरे मित्र श्री विजय सिन्हा जी रेलवे का पेपर देने के लिए नागपुर जा रहे थे.हमदोनो ने या कहे हमलोगों ने नागपुर जाने के लिए इटारसी स्टेशन पर ''दक्षिण एक्सप्रेस'' को पकड़ा...पता नहीं किस विशेषाधिकार के तहत बहुत सारे परीक्षार्थियों का हुजूम दक्षिण एक्सप्रेस के शयनयान श्रेणी (स्लीपर क्लास ) में प्रवेश कर गया....ट्रेन इटारसी से खुली.सम्बंधित कोच का टिकट चेकिंग स्टाफ आया और सबको चेक करने लगा.कुछ लोग ''पास ''लिए हुए थे बाकी बिना किसी अधिकार पत्र या टिकट के सिर्फ इस अथॉरिटी के साथ ट्रेन में घुसे थे कि रेलवे के नौकरी के लिए परीक्षार्थी है ...मै तो कहूँगा वो चेकिंग स्टाफ बहुत भला मानस था जिसने सलाह दिया कि अगले दो स्टेशन के बाद यह ट्रेन रुकेगी और आपलोग उस स्टेशन पर उतर जाना और पीछे से आ रही फ़ास्ट पैसेंजर पर चढ़कर नागपुर चला जाना.आगे स्टेशन पर गाड़ी रुकी.बहुत सारे परीक्षार्थी उत्तर गए.लेकिन जैसे ही ट्रेन फिर से मूव की ..ज्यादातर अनुभवी लोग फिर ट्रेन में सवार हो गए.हम जैसे कुछ अनुभवहीन लोग दुबारा नहीं चढ़ पाए या यूँ कहे की चढ़ने की कोशिश ही नहीं की...जिस स्टेशन पर हमलोग उतरे या यूँ कहे कि उतारे गए उस स्टेशन का नाम था ''घोड़ाडोंगरी''.
बिलकुल ही अपरिचित जगह ,छोटा सा स्टेशन ,छोटा सा टिकेट काउंटर .......बहरहाल हमलोगों ने लाइन में खड़ा होकर टिकेट लेने का फैसला किया.हमलोग लाइन में काफी पीछे थे और फ़ास्ट पैसेंजर के आने का संकेत हो गया...पहले से लाइन में लगे हुए ज्यादातर लोग लोकल नारंगी व्यापारी थे ....जब उनलोगों को मालूम हुआ कि हमलोग परीक्षार्थी है और ''बाहर'' के है तो वे पीछे हो गए और टिकेट बाबु से हमलोगों को पहले टिकट देने का अनुरोध किया ....हमलोगों ने समय रहते नागपुर का टिकेट लिया और ट्रेन भी पकड़ी ........मुझे अपने अभीतक के लगभग दो लाख किलोमीटर तक रेल यात्रा करने में घोड़ाडोंगरी के लोगों के द्वारा उस दिन दिखाई गयी सहृदयता को सर्वाधिक प्रभावित किया है ....मै घोड़ाडोंगरी के लोगों की सहृदयता को ह्रदय से नमन करता हूँ
(यह घटना वर्ष २००३ की है )