गाँधी जी के नाम पर
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वर्ष 2014 में बापू जी के जयंती पर भारत सरकार के तमाम कार्यालयों में विशेष कार्यक्रम हुए. इन विशेष कार्यक्रमों में झाड़ू जैसा अदना चीज भी खास बन गया.या यूँ कहें कि ''झाड़ू लगाना'' परमपरागत पढाई के तीन विधाओं --कला ,विज्ञान और वाणिज्य में से किसी एक का ना रहकर तीनों का हिस्सा हो गया ...झाड़ू जब कैमरा के सामने लगाया जाय तो यह ''कला'' है ...झाड़ू जब साफ़ सफाई के लिए लगाया जाय तो यह ''विज्ञान'' है.....झाड़ू जब पापी पेट के लिए लगाया जाय तो यह ''वाणिज्य'' है.
प्रधानमंत्री जी के स्वच्छता अभियान में जो देश ने देखा वो कला भी था ,विज्ञान भी था और वाणिज्य भी था ..समाज सेवा तो सिर्फ हेडलाइंस में था .इस पुरे कार्यक्रम के लिए सरकारी फंडिंग की गयी थी ना सिर्फ साफ़ सफाई से संवंधित सामानों के खरीदारी के लिए बल्कि इस सोसेबाजी के फोटोग्राफी के लिए ताकि ये मालूम किया जा सके कि ''सफाया '' करने के फ़िराक में रहने वाले किन किन बाबुओ ने ''सफाई'' के लिए कसमें खाई और झाड़ू लगाया....कितना अच्छा होता यदि प्रधानमंत्री जी विशेष अभियान के दिन उन सफाई कर्मचारियों को छुट्टी दे देते जो डेली झाड़ू लगाते है ....और तब देखा जाता कि इस अभियान में कितना सोसाबाजी हुआ है और कितना सफाई .
....बहुत वर्षों के बाद यह एहसास तो हुआ ही कि 2 अक्टूबर को महान बापू की जयंती है ...नहीं तो राष्ट्रीय अवकाश के नाम पर सरकारी बाबु इस डेट में ऐश करते थे ....इमरजेंसी ड्यूटी वाले बाबु ड्यूटी करके कैश करते थे ....
----जिस देश का विज्ञान इतना आगे बढ़ गया हो कि मंगल ग्रह पर भी फतह कर ले उस देश के प्रधानमंत्री जी को देश के नागरिकों को सफाई जैसे मूलभूत चीज से अवगत कराने के लिए अभियान चलाना पड़ता है यह बहुत ही अफ़सोस की बात है ...जय हो
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