शुक्रवार, 25 मार्च 2016

''पुआ '' की आत्मकथा

पुआ की आत्मकथा
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मैं पुआ हूँ,मैं पुआ हूँ
मैं पुड़ी की  बुआ हूँ

मैं होली में हूँ ,दिवाली में हूँ
मैं हर घर की  खुशहाली में हूँ

 अनेकों प्रकार हूँ  ,आकार हूँ
हर हाल में मैं शाकाहार हूँ

देशी पकवान का सर्वोत्तम उपहार हूँ मैं
भक्तों का सर्वोत्तम आहार हूँ मैं

संस्कृत में अपूप हूँ मैं
हिंदी में पुआ हूँ मैं
बंगला में मालपुआ हूँ मै
सभी पकवानों की  बुआ हूँ मै

पकवानों का देशी स्वाद हूँ मैं
वैदिक युग से आबाद हूँ मै

मैं कल भी था ,और आज भी हूँ
मै भोजन का सरताज हूँ

मेरे होने मात्र से भोजन सम्पूर्ण होता है
मेरे होने मात्र से सत्कार परिपूर्ण होता हैं

भोजन का देशी मिजाज हूँ मैं
छपन भोग का साज हूँ मैं

मैं पुआ हूँ मैं पुआ हूँ
मै पुड़ी की बुआ हूँ




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